Jain Online Biodata

All India Jain Biodata Whatsapp Group List Please Join Your State Whatsapp Group An Get Jain Biodata or Send Your Biodata All Near Your Local Place

Showing posts with label 2016. Show all posts
Showing posts with label 2016. Show all posts

Jain Paryushan - जैन पर्युषण

पर्यूषण पर्व जैन धर्म का मुख्य पर्व है। श्वेतांबर इस पर्व को 8 दिन और दिगंबर संप्रदाय के जैन अनुयायी इसे दस दिन तक मनाते हैं। इस पर्व में जातक विभिन्न आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग जैसी साधना तप-जप के साथ करके जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते हैं।
पर्यूषण पर्व का उद्देश्य (Purpose of the Paryushan Parv)
पर्यूषण पर्व का मूल उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करके आवश्यक उपक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। पर्यावरण का शोधन इसके लिए वांछनीय माना जाता है। पर्यूषण पर्व के इस शुभ अवसर पर जैन संत और विद्वान समाज को पर्यूषण पर्व की दशधर्मी शिक्षा को अनुसरण करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
पर्यूषण पर्व समारोह (Celebration of Paryushan Parv)
पर्यूषण पर्व के दौरान मंदिर, उपाश्रय, स्थानक तथा समवशरण परिसर में अधिकाधिक समय तक रहना जरूरी माना जाता है। इस दौरान कई जातक निर्जला व्रत भी करते हैं।
पर्यूषण पर्व की शिक्षा (Teachings of Paryushan Parv)
मानव की सोई हुई अन्त: चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्यूषण पर्व मनाया जाता है। साथ ही यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना भी अनिवार्य है।
Share:

भगवान श्री महावीर स्वामी का जीवन परिचय

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान श्री महावीर स्वामी का जन्म कुंडलपुर वैशाली के इक्ष्वाकुवंश में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में हुआ था। इनके माता का नाम त्रिशला देवी था और पिता का नाम राजा सिद्धार्थ था।
भगवान श्री महावीर स्वामी का जीवन परिचय (Details of Mahavir Swami)
बचपन में इनका नाम वर्धमान था लेकिन बाल्यकाल से ही वह साहसी, तेजस्वी, ज्ञान पिपासु और अत्यंत बलशाली होने के कारण वे महावीर कहलाए। भगवान महावीर ने अपने इन्द्रियों को जीत लिया जिस कारण इन्हें जीतेंद्र भी कहा जाता है। इनके शरीर का वर्ण सुवर्ण था और इनका चिह्न सिंह था। इनके यक्ष का नाम ब्रह्मशांति और यक्षिणी का नाम सिद्धायिका देवी था।
जैन धर्मावलम्बियों के अनुसार भगवान महावीर के गणधरों की कुल संख्या 11 थी, जिनमें गौतम स्वामी इनके प्रथम गणधर थे। भगवान महावीर ने मार्गशीर्ष दशमी को कुंडलपुर में दीक्षा की प्राप्ति की और दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् 2 दिन बाद खीर से इन्होंने प्रथम पारण किया था। दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् 12 वर्ष 6।5 महीने तक कठोर तप करने के बाद वैशाख शुक्ला दशमी को ऋजुबालुका नदी के किनारे साल वृक्ष के नीचे भगवान महावीर को कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
भगवान महावीर अहिंसा और अपरिग्रह के साक्षात् मूर्ति थे। वे सभी के साथ सामान भाव रखते थे और किसी को कोई भी दुःख देना नहीं चाहते थे। अपनी श्रद्धा से जैन धर्म को पुनः प्रतिष्ठापित करने के बाद कार्तिक अमावस्या दीपावली के दिन पावापुरी में भगवान महावीर ने निर्वाण को प्राप्त किया था।


भगवान श्री महावीर स्वामी ने जैन धर्म को पुन: स्थापित कर विश्व को एक ऐसी शाखा प्रदान की जो पूर्णत: अहिंसा और मानवता पर आधारित थी। आध्यात्म के साथ महावीर स्वामी जी ने इस धर्म को आगे बढ़ने का भी सपना दिया। महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद जैन धर्म दो संप्रदायों में बंट गया लेकिन बंटने के बाद भी जैन धर्म में व्याप्त स्वामी जी की शिक्षाओं को कोई हानि नहीं हुई है।
Share:

jain paryushan 2016




वर्षा ऋतु में अनंत जीवों की उत्पत्ति होती है | हमारे आवागमन से इनकी हिंसा से बचने हेतु परमात्मा ने चातुर्मास (चोमासा) प्रणाली स्थापित की थी | साधु-साध्वी चातुर्मास यानी वर्षाकाल में एक ही जगह स्थिरता करते हैं – मुख्य कारण है जीव हिंसा की विराधना से बचने का |

सीधी सरल व्यवस्था व हिंसा से बचने हेतु इसका स्वरूप बना | वर्षा काल में गोचरी इत्यादि की बाधा उत्पन्न हो तो ऐसे समय में अनुकूलता अनुसार तप साधना का भी दिशा निर्देश दिया गया है |

आजकल मौसम चक्र अचानक बदलता है बेमौसम वर्षा भी होती है | ऐसे संयोग में भी एक जगह स्थिरवास हो | जहां पर स्थितवास हो वहां के सभी लोगों (स्थानीय भी) को धर्म के सिद्धांतों का ज्ञान बाटना – प्रवचन (व्याख्यान) के माध्यम से एवं योग्य शिक्षक (पंडित) द्वारा स्वयं की ज्ञान-ध्यान की साधना को और व्यापक बनाना – यह चातुर्मास की व्यवस्था का अंग है |

लेकिन आज आधुनिकता के इस युग में वर्षाकाल में भी ‘धर्म’ के नाम पर विशाल उत्सव मनाएं जाते हैं | अपनी या अपने गुरुओं की जयंती, विभिन्न धार्मिक उत्सव इत्यादी अत्यंत धूमधाम से मनाये जाते हैं जबकि धर्मगुरुओं को अच्छी तरह पता है कि वर्षाकाल में जीवों की उत्पत्ति अधिक होने से जीव हिंसा कितनी बढ जाती है ?

ऐसे आयोजनों में बाहर से प्रमुख अतिथिगण को बुलाया जाता है | स्थानीय शहर में हर कोने कोने से परिवहन की व्यवस्था की जाती है | विशाल तादात में आने वाले श्रद्धालुओं हेतु भोजन व्यवस्था एवं अन्य कई तरह की व्यवस्थाएं… तब यह हिंसा का मापदंड कहा जाता है, संसारी व्यक्ति भी चातुर्मास के महीनों में शादी विवाह इत्यादि समारंभ के आयोजन वर्षाकाल में अति जीव हिंसा से बचने हेतु नहीं करता है |

चूँकि वर्षा ऋतु में जीव हिंसा अति होती है, ऐसे धार्मिक आयोजनों में सुबह का नाश्ता सूर्योदय के पश्चात ही तैयार किया जाए | सीरा, मूंग पूरी, इडली, डोसा, केसरी भात, उप्पीट इत्यादि कई खाद्यान है जो सूर्योदय के पश्चात तैयार कर नवकारसी तक सुगमता से तैयार कर परोसे जा सकते हैं |

इसी प्रकार सुबह शाम का भोजन भी तय समय पर सहजता से संपन्न हो सकता है | अगर संख्या की सीमित हो तो व्यवस्था भी सुगम होती है और हिंसा से काफी हद तक बचा जा सकता है | प्रयास हो हर कार्य में सादगी लाने के | धार्मिक आयोजनों में आने वालों की संख्या का सही आभास नहीं होता अतः से ऐसे सात्विक तुरंत बनाए जा सकने वाले भोजन बनाकर पापों से भी बचा जा सकता है | किसी भी खाद्य प्रदार्थ के बिलकुल झूठा नहीं छोड़ने के प्रयास हो |

लेकिन अज्ञानता वश, प्रदर्शन वश, जाने-अनजाने में अति हिंसा कर बैठते हैं | यह शिक्षा धर्म गुरु व साध्वीगण सभी को दें ताकि हमारे अहिंसा के सिद्धांतों का बारीकी से पालन हो |

क्या इन आयोजनों को शांतिपूर्वक धर्म के सिद्धांतों, तप व साधना से नहीं मनाया जा सकता | क्या ऐसे आयोजन पैसे के, वैभव के प्रदर्शन नहीं बनते जा रहे है ? कहां गया धर्म का वह सूक्षम ज्ञान जो हिंसा से बचने की सीख देता है ?

JAIN MATRIMONIAL


अपने विचार व्यक्त करे
COMMENT BOX 
#SHARE #LIKE #WHATSAPP #FOLLOW US

-------------
Share: